रेत के महल

रेत के महल हथेली पर सजाये
कब तक रहेंगे ख़ुद को बहलाये
मानवता टूट कर है बिखर रही
समय रहते कोई सोच लें उपाय।

मूल्य हो रहे हैं सारे ध्वस्त
लूटें असमत जो हैं विश्वस्त
किस पर अब करें विश्वास
सारे सम्बंध हो गये निरस्त ।

रक्षक भी हो गये हैं भ्रष्ट
अपने आप में सब हुये मस्त
दोषारोपण सब करते हैं रहते
लीपापोती में हैं रहते व्यस्त ।

-सूक्ष्म लता महाजन

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